प्रभा भैया : उम्र की सीमाओं से परे एक अद्वितीय व्यक्तित्व
प्रभा भैया
उम्र की सीमाओं से परे का एक अद्वितीय व्यक्तित्व
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपना जीवन नहीं जीते, बल्कि अपने जीवन से एक विचार, एक प्रेरणा और एक संदेश रचते हैं। प्रभा भैया ऐसा ही एक विलक्षण व्यक्तित्व हैं, जिनके जीवन को किसी एक पहचान में बाँधना संभव नहीं है। वे एक साथ तैराक, योग साधिका, चित्रकार, मूर्तिकार, साहित्यप्रेमी, शिक्षिका और जीवन-साधिका हैं।
सामान्यतः जीवन के उत्तरार्ध को विश्राम का काल माना जाता है, लेकिन प्रभा भैया ने उसे सृजन का स्वर्णिम अवसर बना दिया। जिस आयु में अधिकांश लोग अपनी उपलब्धियों को याद करते हैं, उस आयु में उन्होंने नई उपलब्धियों का इतिहास रचा। दुबई में तैराकी के चार स्वर्ण पदक प्राप्त करना केवल एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि यह उस अटूट आत्मविश्वास का प्रमाण है जो उन्हें साधारण लोगों से अलग बनाता है।
उनकी एक और विशेषता है—पानी में योग करने की अनूठी साधना।बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के उन्होंने जल-योग को अपनाया और उसे अपनी पहचान बना लिया। यह केवल शारीरिक क्षमता का नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और नवाचार की सोच का भी परिचायक है। उन्होंने सिद्ध किया कि सीमाएँ शरीर में नहीं, विचारों में होती हैं।
कला के क्षेत्र में उनका व्यक्तित्व और भी अद्भुत दिखाई देता है। बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के उन्होंने चित्रकला में ऐसी पहचान बनाई कि उनकी “वानप्रस्थ : रंगप्रस्थ” प्रदर्शनी चर्चा का विषय बन गई। उनकी कूची केवल रंग नहीं बिखेरती, बल्कि जीवन के अनुभवों, भावनाओं और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को कैनवास पर सजीव कर देती है। उनकी प्रत्येक रचना उनके अंतर्मन की यात्रा का दस्तावेज़ प्रतीत होती है।
गणेश प्रतिमाओं का निर्माण उनकी सृजनशीलता का एक और आयाम है। विभिन्न सामग्रियों से निर्मित उनकी प्रतिमाएँ केवल कलाकृतियाँ नहीं, बल्कि श्रद्धा, धैर्य और कल्पनाशीलता का सुंदर संगम हैं। उन्होंने यह दिखाया कि कला तब सर्वोत्तम होती है जब उसमें भक्ति और भावनाएँ समाहित हों।
प्रभा भैया का व्यक्तित्व केवल कला और खेल तक सीमित नहीं है। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा, शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में योगदान, अध्यापन का अनुभव और लेखन के प्रति रुचि उनके व्यक्तित्व को और अधिक समृद्ध बनाती है। वे जीवन को एक सतत सीखने की प्रक्रिया मानती हैं और इसी कारण हर नई चुनौती को अवसर में बदल देती हैं।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी उम्र को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। वे उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो यह मान लेते हैं कि कुछ कार्य करने के लिए एक निश्चित आयु होती है। प्रभा भैया का जीवन कहता है कि “सपनों की कोई उम्र नहीं होती, और सृजन का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता।”
वास्तव में प्रभा भैया एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत संदेश हैं—
कि यदि मन में उत्साह, आत्मविश्वास और कुछ नया करने का साहस हो, तो जीवन का प्रत्येक चरण एक नई शुरुआत बन सकता है।
उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रेरणा छोड़ता है कि जीवन की सार्थकता वर्षों की संख्या में नहीं, बल्कि उन सपनों में है जिन्हें हम जीने का साहस करते हैं।
सहेजी गई स्मृतियाँ
सूचना स्रोत
विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन, महिला लेखिका प्रकोष्ठ
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति



















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