विजय सिंह 'पथिक'

उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में तहसील मवाना स्थित ग्राम पाली के मौलिक कवि विजय सिंह 'पथिक' जी से मिलने का सौभाग्य उन्नत कृषक श्री प्रकाशचंद जी के प्रयासों से संभव हो सका। विजय सिंह एक नैसर्गिक कवि जिनकी महारथ है त्वरित काव्य रचना करने में। अरसा पूर्व काव्य रचना लिखकर किया करते थे, लेकिन उनके द्वारा संकलित रचनाओं को लेकर आपके साथ एक ऐसी घटना हुई कि उन्होंने काव्य लिखकर करना त्याग दिया और उसके बाद से अब उनका काव्य मौलिक है और संस्कृति को सहेजता हुआ। विषय कोई भी हो सब में सांस्कृतिक मूल्यों की झलक मिलती है। मुलाकात के समय उन्होंने जीवन की कुछ दिलचस्प घटनाएं सुनाईं। ईशकृपा को लेकर भी उन्होंने जीवन की कुछ झलकियां सुनायीं। एक बार २६ जनवरी के अवसर पर अपनी काव्य रचनाएं किसी शिक्षण संस्थान में सुनाने के ध्येय से अपनी पुत्री की ससुराल दिल्ली गए, लेकिन आकस्मिक कारणों से ऐसा संभव ना हो सका तो निराशा भाव से भर कर लौटने लगे। वापसी में बस यात्रा के दौरान उनको एक युवती मिली जिसने उनसे मोदीनगर में उतरने का आग्रह किया। पथिक जी असमंजस में पड़ गए। और! वे युवती के पुनः किए आग्रह को टाल नहीं सके और युवती के साथ बस से उतर गए। बस से उतर कर युवती उनको स्टेट बैंक की एक शाखा में ले गई और उनसे ध्वजारोहण कराया। ऐसे में आकस्मिक रूप से उनकी मन की मुराद पूरी होने पर ईश्वर का धन्यवाद किया और ध्वजारोहण के उपरांत निम्न कविता बैंक कर्मियों को सुनाई - 

मैं देता हूँ धन्यवाद उसे 

अपना हर काम छोड़कर

जो गणतन्त्र दिवस पर मिली मुझे 

दिल्ली रोड पर 

जो मिली दिल्ली रोड पर 

वह पर्वत से भी भारी थी 

मैं उसके कद को नाप सका ना 

वह इतनी ऊंची नारी थी 

वह इतनी ऊंची नारी थी 

मैं देख उसे हैरान हुआ 

हुआ अचंभा मुझको भारी

जब उसने मेरे पैर छुए। 

मैंने मन की आँखें खोली थीं  

सदा सुखी रहना बेटी

मेरी साफ़ आत्मा बोली थी 

सूचना स्रोत

श्री विजय सिंह पथिक

प्रस्तुति



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