कर्तव्य को सर्वोपरि रखने वाले परम सिंह जी
भूमिका
सृष्टि में कुदरत ने ऐसे अनेक बिरले मानव संसाधन दिए हैं जो अपने आप को स्वाभाविक तरीके से अपने व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं करते हैं और प्रचार या प्रसार के लिए नहीं अपितु समाज निर्माण के ध्येय से तथा एक सत्यपरक तथ्य यह है कि वो ऐसा कर भी पाते हैं। आइए आज जानते हैं एक ऐसी ही शख्सियत परम सिंह जी के बारे में।
कर्तव्य सर्वोपरि
अभी कुछ दिन पूर्व ही हसनपुर में श्रीमती सुखदेवी इंटर कालेज के प्रधानाचार्य परम सिंह को 'भारत विभूति सम्मान' मिलने पर जनमानस के द्वारा यदि हर्ष जताया गया तो यह यूं ही नहीं था। इस विभूति ने साधना की है और निर्लोभ। और! साधना अभी जारी है बालकों के जीवन को संवारने की। सब कुछ 'संकल्प' के अंतर्गत चल रहा है जिसको उन्होंने विद्यालय के दैनिक क्रियाकलापों को एक प्रेरक पुस्तिका का रूप दे दिया तो इसलिए कि विद्यालय इसको अक्षरशः लागू कर दे और उनका विद्यालय एक आदर्श विद्यालय बन जाए। दिलचस्प यह है कि उनके संकल्प को अनेक विद्यालय मौन ही अंगीकृत कर लाभान्वित हो रहे हैं। ईश्वर भी इनके समक्ष उत्पन्न होने वाली बाधाओं से लगातार उबार रहे हैं तो क्षेत्र में इनकी लोकप्रियता ही से यह हर्ष भी स्वतः ही नगर भर में व्याप्त है।
मानव जीवन को कितना विस्तारित किया जा सकता है इसका आकलन कोई सरल सहज कार्य नहीं। परम सिंह जी धारा के विपरीत सफलतापूर्वक तैरने का कौशल रखते हैं। शिक्षार्जन के उपरांत जीवन-यापन के विविध स्रोतों का स्पर्श करते हुए आज वो हसनपुर स्थित श्रीमती सुखदेवी इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य के पद को सुशोभित कर रहे हैं। शैक्षणिक सुधारों को लेकर निरंतर प्रयासरत रहते हैं और शैक्षणिक प्रक्रिया को व्यवस्थित रखने के ध्येय से संकल्प शीर्षक से एक विद्यालयी व्यवस्थापन कैप्सूल संकल्प की रचना कर प्रसिद्धि पा चुके हैं। निरंतर शैक्षणिक सुधारों के बारे में सोचते हैं और विद्यार्थी हित में विद्यार्थियों के लिए सदैव सुलभ हैं। शैक्षणिक चैनलों की कलुषिता से परे रहकर उत्तम सोचते और उत्तम करते हैं। संकल्पबद्ध तरीके से निर्भीक जीवन व्यतीत करने के अभ्यस्त हैं और अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं। कृतज्ञ हैं अपने अभिभावकों समेत उन सभी के जिन्होंने भी निर्लोभ उनके जीवन को व्यवस्थित करने कराने में उनका सहभाग किया। विशेष रूप से स्मरण करते हैं अपने शिक्षक डॉक्टर हरिवंश दीक्षित जी का। मानव जीवन को संघर्ष की संज्ञा देना यदि उपयुक्त कहा जायेगा तो जीवन के झंझावातों के कारण। इस ब्लॉग में जिन परम सिंह का विवरण दिया जा रहा है वो ऐसे झंझावातों से जूझने के माहिर हैं।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें