साहित्य, संस्कृति और समर्पण की प्रतीक व्यक्तित्व हैं डॉ. कमला गोकलानी

डॉ. कमला गोकलानी एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने सिंधी और हिंदी साहित्य को अपनी लेखनी, अनुवाद, और संपादन के माध्यम से समृद्ध किया है। वे न केवल एक कुशल लेखिका और भाषाविद् हैं, बल्कि एक संवेदनशील शिक्षिका, सजग संपादिका और समर्पित सांस्कृतिक साधिका भी हैं। उनके लिए साहित्य मात्र शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि विचार, अनुभूति और संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम है।

उच्च शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने एम.ए., पीएच.डी. (सिंधी), एम.ए. (हिंदी), एम.एड. और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा जैसी विविध योग्यताएँ प्राप्त की हैं। अपने अकादमिक और साहित्यिक जीवन के समन्वय से उन्होंने न केवल शिक्षण के क्षेत्र में बल्कि शोध और सृजन में भी अनुकरणीय योगदान दिया है। वे स. पू. चौ. राजकीय महाविद्यालय, अजमेर में आचार्य पद से सेवानिवृत्त हुईं और महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में सिंधू शोध पीठ की उपनिदेशक रही हैं।

61 से अधिक प्रकाशित पुस्तकों की लेखिका डॉ. गोकलानी को अनेक राष्ट्रीय और प्रांतीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। विशेष रूप से 2010 में साहित्य अकादमी द्वारा कबीर ग्रंथावली के काव्यानुवाद के लिए प्राप्त राष्ट्रीय सम्मान उनकी अनुवाद साधना की ऊँचाई को रेखांकित करता है।

उनका संपादकीय योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वे वर्षों से ‘रिहाण’, ‘वरदाई’, ‘रचना’, ‘आत्म दर्शन’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन करती रही हैं और 1998 से ‘सिंधी साहित्य सुरभि’ की निरंतर संपादिका हैं। उनके लिए संपादन एक सांस्कृतिक दायित्व है, जहाँ वे नई प्रतिभाओं को मंच देती हैं और लोक चेतना को अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं।

डॉ. गोकलानी की लेखन प्रक्रिया अनुभव, अध्ययन और आत्मीय जुड़ाव की त्रयी पर आधारित है। वे मानती हैं कि जब विषय मन को छूता है, तो शब्द अपने आप आकार लेने लगते हैं। उनकी लेखनी में संवेदना, गहराई और बौद्धिक प्रामाणिकता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

उनकी सबसे बड़ी संतुष्टि तब मिलती है जब कोई पाठक यह कहता है कि उनकी कृति ने जीवन के दृष्टिकोण को बदल दिया या कठिन समय में संबल बनी। यही लेखन की सार्थकता है — यही उनकी साधना का फल।

नई पीढ़ी के लिए उनका संदेश स्पष्ट है: 

"भाषा और संस्कृति से जुड़ाव बनाए रखें। तकनीक के साथ कदम मिलाएं, पर अपनी जड़ों को न भूलें। साहित्य केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, यह संवेदना का सेतु है — इसे थामे रहें, और शब्दों में अपने समय को दर्ज करते रहें।"

सूचना स्रोत


डॉ छाया शर्मा 
(स्थानीय सम्पादिका)
उलझन सुलझन (लेडीज विंग) 
अजमेर राजस्थान 
पाठ्य विस्तार
चैट जीपीटी 
प्रस्तुति 





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