प्रगतिशील कृषक सुरेंद्र अवाना
प्रगतिशील कृषक सुरेंद्र अवाना
एकीकृत कृषि, गौ-संवर्धन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का प्रेरक मॉडल
विशेष आलेख | उलझन सुलझन
भारत की कृषि व्यवस्था आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। बढ़ती लागत, घटते प्राकृतिक संसाधन, जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितताओं के बीच यदि कोई मॉडल किसानों को स्थायी आय, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समृद्धि का मार्ग दिखा रहा है, तो वह है एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System)। इस दिशा में राजस्थान की धरती पर कार्यरत प्रगतिशील कृषक श्री सुरेंद्र अवाना का व्यक्तित्व एक प्रेरणादायी उदाहरण बनकर उभरता है।
हाल ही में जयपुर स्थित उनके निवास पर श्री मोहनलाल वर्मा, प्रो. राकेश राणा, असिस्टेंट प्रोफेसर देवेंद्र नागर तथा उलझन सुलझन के प्रतिनिधि ने उनसे आत्मीय भेंट कर कृषि, नवाचार, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण तथा एकीकृत कृषि के विविध आयामों पर विस्तृत चर्चा की। यह मुलाकात केवल परिचय भर नहीं थी, बल्कि भारतीय कृषि के भविष्य पर गंभीर चिंतन का अवसर भी बनी।
450 गिर गौवंश के साथ आत्मनिर्भर कृषि का जीवंत उदाहरण
श्री सुरेंद्र अवाना का सबसे उल्लेखनीय कार्य है लगभग 450 गिर नस्ल की गौमाताओं का सुव्यवस्थित पालन। सामान्यतः इतनी बड़ी गौशाला का संचालन अपने आप में चुनौतीपूर्ण माना जाता है, किंतु उन्होंने इसे केवल पशुपालन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे कृषि की संपूर्ण अर्थव्यवस्था का आधार बना दिया है।
गिर नस्ल अपनी उच्च दुग्ध क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और भारतीय जलवायु के अनुकूलता के लिए प्रसिद्ध है। इन गौमाताओं से प्राप्त दूध, गोबर और गोमूत्र का उपयोग कृषि, जैविक खाद निर्माण तथा प्राकृतिक खेती में प्रभावी ढंग से किया जाता है। इस प्रकार पशुपालन और खेती एक-दूसरे के पूरक बनकर आय के अनेक स्रोत निर्मित करते हैं।
एकीकृत कृषि : जहाँ हर संसाधन बनता है उपयोगी
श्री अवाना का मानना है कि आधुनिक किसान को केवल खेत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। खेती, पशुपालन, चारा उत्पादन, जैविक खाद, जल संरक्षण, ऊर्जा प्रबंधन और कृषि प्रसंस्करण—इन सभी को एक सूत्र में पिरोकर ही कृषि को लाभकारी बनाया जा सकता है।
उनके मॉडल में खेत से निकलने वाला अवशेष पशुओं का चारा बनता है, पशुओं से प्राप्त गोबर जैविक खाद में परिवर्तित होता है, वही खाद पुनः खेतों की उर्वरता बढ़ाती है और खेत बेहतर उत्पादन देकर पूरे चक्र को सतत बनाए रखते हैं। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लागत घटाने और आय बढ़ाने का भी प्रभावी माध्यम है।
गौ-आधारित अर्थव्यवस्था की पुनर्स्थापना
भारतीय कृषि संस्कृति में गाय केवल पशु नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी रही है। श्री सुरेंद्र अवाना इस परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पुनर्जीवित कर रहे हैं। उनका प्रयास दर्शाता है कि यदि उचित प्रबंधन, वैज्ञानिक सोच और दूरदृष्टि अपनाई जाए तो गौपालन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक समृद्धि का भी मजबूत आधार बन सकता है।
युवा किसानों के लिए प्रेरणा
संवाद के दौरान यह विचार विशेष रूप से उभरकर सामने आया कि आज का युवा किसान यदि तकनीक, नवाचार और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाए तो वह खेती को लाभकारी उद्यम में बदल सकता है। कृषि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और प्रगतिशील किसानों के बीच निरंतर संवाद ही कृषि विकास की गति को नई दिशा देगा।
ग्रामीण भारत के विकास का मॉडल
श्री सुरेंद्र अवाना का कार्य यह सिद्ध करता है कि आत्मनिर्भर भारत का सपना गाँवों से ही साकार होगा। जब किसान उत्पादन के साथ-साथ संसाधनों का समुचित प्रबंधन, मूल्य संवर्धन और जैविक संतुलन स्थापित करेगा, तभी कृषि वास्तव में समृद्धि का आधार बनेगी।
उनकी कार्यशैली यह संदेश देती है कि कृषि केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि विज्ञान, प्रबंधन, पर्यावरण और सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वित स्वरूप है। ऐसे प्रगतिशील कृषक देश के लिए प्रेरणा हैं और कृषि क्षेत्र में नई पीढ़ी के मार्गदर्शक भी।
उलझन सुलझन की दृष्टि
आज आवश्यकता केवल अधिक उत्पादन की नहीं, बल्कि सतत, समावेशी और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था विकसित करने की है। श्री सुरेंद्र अवाना जैसे कृषक इस परिवर्तन के अग्रदूत हैं। उनका अनुभव बताता है कि जब ज्ञान, नवाचार, गौ-संवर्धन और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता एक साथ जुड़ते हैं, तब कृषि केवल व्यवसाय नहीं रहती—वह राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बन जाती है।
"एकीकृत कृषि केवल खेती की पद्धति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर किसान और समृद्ध भारत की आधारशिला है।"
सूचना स्रोत
श्री मोहनलाल जी वर्मा
जयपुर
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति










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