मानसिक विषाक्तता को समझने से खुशहाली की ओर बढ़ने का मार्ग
मानसिक विषाक्तता को समझने से खुशहाली की ओर बढ़ने का मार्ग
एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा में ‘टॉक्सिक : मानसिक विषाक्तता से खुशहाली की ओर’ विषय पर संवाद
उलझन सुलझन प्रतिनिधि | नोएडा
मनुष्य के जीवन में विषाक्तता केवल बाहरी वातावरण, खान-पान या भौतिक परिस्थितियों तक सीमित नहीं होती। विचारों में लगातार बनी नकारात्मकता, अनियंत्रित तनाव, भावनात्मक दबाव, अस्वस्थ संवाद और रिश्तों में बढ़ती दूरी भी व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसी व्यापक दृष्टि को सामने रखते हुए एमिटी विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के रेखी फाउंडेशन सेंटर फॉर साइंस ऑफ हैप्पीनेस की ओर से विद्यार्थियों के लिए ‘टॉक्सिक : मानसिक विषाक्तता से खुशहाली की ओर’ विषय पर विशेष संवाद सत्र आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा, संस्थापक बत्रा ग्रुप ऑफ क्लीनिक्स, मुंबई तथा ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी, संस्थापक ओशो फ्रेग्रेन्स, ने विद्यार्थियों के साथ मानसिक एवं भावनात्मक विषाक्तता, तनाव, ध्यान, आत्म-जागरूकता, रिश्तों और उद्देश्यपूर्ण जीवन जैसे विषयों पर संवाद किया। यह कार्यक्रम ‘खुशहाली और अध्यात्म पर वैश्विक नेताओं के साथ संवाद’ श्रृंखला का हिस्सा था तथा सेंटर फॉर साइंस ऑफ हैप्पीनेस के पॉडकास्ट का 32वाँ सत्र भी बताया गया।
भीतर की स्थिति को पहचानना भी जरूरी
संवाद में यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि व्यक्ति अपने जीवन में उत्पन्न तनाव और नकारात्मकता को समझे बिना केवल बाहरी परिस्थितियों में परिवर्तन करके स्थायी संतुलन प्राप्त नहीं कर सकता।
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने मानसिक विषाक्तता को विचारों, भावनाओं, व्यवहार और रिश्तों से जोड़ते हुए आत्म-जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, व्यक्ति जब अपने भीतर चल रही प्रक्रियाओं को पहचानना प्रारंभ करता है, तभी आवश्यक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना बनती है।
सेंटर फॉर साइंस ऑफ हैप्पीनेस के प्रमुख प्रो. नितिन अरोरा ने भी विद्यार्थियों से अपने जीवन में तनाव और नकारात्मकता के स्रोतों को पहचानने तथा स्वस्थ सोच, बेहतर संबंधों और संतुलित जीवन की दिशा में प्रयास करने की बात कही।
स्वास्थ्य और मानसिक खुशहाली पर संवाद
कार्यक्रम के पहले चरण में पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा ने विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए मानसिक विषाक्तता और खुशहाली के संबंध, चिंता और अवसाद के शुरुआती संकेत तथा स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े विषयों पर चर्चा की। होम्योपैथी की भूमिका पर भी संवाद हुआ।
इसके बाद स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने ध्यान, मन की बेचैनी और आंतरिक शांति जैसे विषयों पर विद्यार्थियों से बातचीत की। उन्होंने ध्यान को केवल किसी तकनीक के रूप में देखने के बजाय स्वयं को समझने और जागरूक होने की प्रक्रिया के रूप में देखने की बात कही।
तकनीक से रिश्तों और सकारात्मक भावनाओं को जोड़ने का प्रयास
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थियों द्वारा विकसित किए गए दो डिजिटल नवाचार रहे।
पहला नवाचार एक संवाद-सहायक चैटबॉट था, जिसका उद्देश्य तनावपूर्ण या नकारात्मक बातचीत की स्थिति में व्यक्ति को तत्काल प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरकर सोचने और बेहतर संवाद का विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करना है।
दूसरा नवाचार चेहरे पर मुस्कान की पहचान करने वाला डिजिटल उपकरण था, जो मुस्कान को सकारात्मक भावनात्मक अभिव्यक्ति से जुड़े एक संकेत के रूप में पहचानने का प्रयास करता है।
इन दोनों प्रस्तुतियों से यह प्रश्न भी सामने आता है कि तकनीक को केवल सुविधा का माध्यम न मानकर मानवीय संवाद, भावनात्मक जागरूकता और सकारात्मक व्यवहार के लिए किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है।
विद्यार्थियों के प्रश्नों में जीवन की वास्तविक उलझनें
प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने जीवन से जुड़े व्यावहारिक प्रश्न उठाए। प्रियजन को खोने के बाद उत्पन्न भावनात्मक स्थिति, प्री-डायबिटीज के शुरुआती संकेत, दूसरों से तुलना और प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलने की कठिनाई, अपनी गलती स्वीकार करने में होने वाला संकोच तथा परिवर्तन की आवश्यकता को समझने के बावजूद उसे व्यवहार में न ला पाने जैसे विषय चर्चा में आए।
इन प्रश्नों ने यह स्पष्ट किया कि युवाओं की खुशहाली केवल शैक्षणिक या व्यावसायिक सफलता का विषय नहीं है। इसके साथ भावनात्मक संतुलन, स्वस्थ रिश्ते, आत्म-स्वीकृति, निर्णय क्षमता और अपने व्यवहार को समझने की क्षमता भी जुड़ी हुई है।
पुस्तक के माध्यम से भी विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास
कार्यक्रम के दौरान डॉ. मुकेश बत्रा और स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी द्वारा सहलिखित पुस्तक ‘Toxic: Stories, Science and Remedies for a Cleaner Mind, Body and Spirit’ का उल्लेख भी किया गया। पुस्तक में शरीर और जीवनशैली से जुड़े विषैले तत्वों के साथ तनाव, नकारात्मक विचारों, भावनात्मक दबाव और रिश्तों में उत्पन्न मानसिक विषाक्तता जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।
लेखकों के अनुसार पुस्तक का पहला संस्करण बिक चुका है तथा 21 सितंबर को दिल्ली में इसके विमोचन और प्रेस वार्ता का कार्यक्रम निर्धारित किया गया था। आयोजकों की जानकारी के अनुसार इसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों तथा प्रकाशन संस्था ब्लूम्सबरी के प्रतिनिधियों की सहभागिता प्रस्तावित थी।
विश्वविद्यालय नेतृत्व की सहभागिता
कार्यक्रम के दौरान एमिटी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अकादमिक नेतृत्व से जुड़े एडिशनल प्रो वाइस चांसलर प्रो. डॉ. संजीव बंसल, एमिटी विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ के चांसलर एवं एएसटीआईएफ के अध्यक्ष प्रो. डॉ. डब्ल्यू. सेल्वमूर्ति तथा एमिटी विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश की कुलपति प्रो. डॉ. बलविंदर शुक्ला ने भी दोनों वक्ताओं से मुलाकात की।
उलझन सुलझन की दृष्टि से
इस संवाद का व्यापक संदेश किसी एक व्यक्ति, संस्था या विचार-पद्धति तक सीमित न रखकर सामान्य जीवन में समझा जा सकता है। मनुष्य के जीवन में तनाव, असहमति, तुलना, भावनात्मक दबाव और रिश्तों में कठिनाइयाँ स्वाभाविक रूप से आ सकती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति उन्हें पहचानने, समझने और आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता लेने की दिशा में कितना सजग होता है।
उलझन सुलझन की दृष्टि से इस पूरे संवाद का सार यही है कि बाहरी परिस्थितियों को बदलने के प्रयासों के साथ-साथ अपने विचारों, भावनाओं, व्यवहार और संवाद की शैली को समझना भी आवश्यक है। आत्म-जागरूकता, स्वस्थ संवाद, संतुलित जीवनशैली और आवश्यकता के अनुसार विशेषज्ञ सहायता—ये सभी व्यक्ति को अपनी उलझनों को बेहतर ढंग से समझने में सहयोग दे सकते हैं।
सृजक
प्रस्तुति











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